ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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दिल्ली में साइबर अपराधियों ने एक 81 वर्षीय डॉक्टर और उनकी 77 वर्षीय पत्नी को ‘डिजिटल अरेस्ट’ नामक चाल के जाल में फँसा कर करीब ₹14.85 करोड़ (लगभग 15 करोड़) की ठगी कर ली। यह मामला देश में साइबर ठगी की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली घटनाओं में से एक माना जा रहा है, जिसने तकनीकी रूप से उन्नत धोखाधड़ी के खतरों को फिर से उजागर किया है।
डिजिटल अरेस्ट क्या है?
‘डिजिटल अरेस्ट’ किसी कानूनी प्रक्रिया का वास्तविक नाम नहीं है, बल्कि यह एक साइबर ठगी की नई और बेहद खतरनाक तकनीक है जिसमें ठग खुद को सरकारी अधिकारी, पुलिस, न्यायालय और विभिन्न संस्थाओं का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। ठगी करने वाले आरोपियों ने तकनीकी रूप से नकली दस्तावेज, “अरेस्ट मेमो”, सरकारी सील और वीडियो कॉल के जरिए इसे वास्तविक दिखाया। इसके चलते पीड़ितों को लगा कि वे सच्चाई में किसी जांच के दायरे में हैं और अगर उन्होंने सहयोग नहीं किया तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
कहानी कैसे शुरू हुई?
यह पूरा मामला 24 दिसंबर 2025 को शुरू हुआ, जब डॉक्टर दंपति को मोबाइल पर एक फोन आया। फोन करने वाले ने खुद को टेलिकॉम नियामक अधिकारी (TRAI) बताकर कहा कि उनके आधार कार्ड से जुड़ा बैंक खाता मनी लॉन्ड्रिंग और अन्य अवैध गतिविधियों में इस्तेमाल हुआ है। बात आगे बढ़ते-बढ़ते, वीडियो कॉल में नकली कोर्ट का सेट-अप, नकली पुलिस अधिकारी और नकली सुप्रीम कोर्ट के जज तक को शामिल कर ठगों ने दंपति के मन में भय पैदा कर दिया।
ठगों ने उन्हें 24 दिसंबर से 9 जनवरी तक लगभग 15 दिनों तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रखा। इस बीच फोन और वीडियो कॉल दोनों पर लगातार दबाव बनाते हुए परिवार को अलग-थलग रख दिया गया और किसी से संपर्क करने की अनुमति नहीं दी गई।
कैसे हुआ ₹15 करोड़ की ठगी?
आरोपियों ने दंपति को बार-बार बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया — हर बार अलग-अलग नाम और बहाने के साथ। कभी जाँच शुल्क, कभी कोर्ट वेरिफिकेशन, तो कभी जमानत जैसे नाम पर पैसे मांगे गए। कुल मिलाकर लगभग ₹14.85 करोड़ उनके खाते से निकालकर विभिन्न खातों में भेज दिए गए।
जांच में पता चला कि ठगी गई रकम को छिपाने के लिए 700 से अधिक ‘म्यूल’ बैंक खातों में पैसे को घुमाया गया। कुछ खाते गुजरात, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तराखंड में थे। इन्हीं खातों से पैसे को और भी नीचे के खातों में लिया-दिया किया गया है, ताकि पुलिस का ट्रेल मुश्किल हो जाए।
पुलिस की कार्रवाई और जांच
दिल्ली पुलिस की साइबर क्राइम यूनिट ने इस मामले में ई-FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस ने अब तक ₹1.9 करोड़ फ्रीज करने में सफलता पाई है और संदिग्ध खातों की पहचान तथा पैसों के ट्रैकिंग में बैंक व फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट की मदद ली जा रही है। ठगी के मुख्य आरोपी अभी तक पकड़े नहीं गए हैं, लेकिन जांच तेजी से आगे बढ़ रही है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य, सरकारी या तकनीकी जांच से जुड़ा कोई भी आधिकारिक एजेंसी कभी भी पैसे या बैंक ट्रांसफर नहीं मांगती, न ही वीडियो कॉल के ज़रिये आपको ‘डिजिटल अरेस्ट’ कर सकती है। साइबर ठगी से बचने के लिए लोगों को संदिग्ध कॉल काट देने, किसी भी अनजान लिंक पर क्लिक न करने, और तुरंत पुलिस से संपर्क करने की सलाह दी जा रही है।
Jan 14, 2026
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