ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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भाई-बहन का रिश्ता प्यार, नोकझोंक और छोटी-छोटी लड़ाइयों से भरा होता है। लेकिन जब भाई की जिंदगी पर संकट आया, तो नेपाल की एक बहन ने ऐसा कदम उठाया जिसने उसे नई जिंदगी दे दी। नोएडा के चाइल्ड पीजीआई में 12 वर्षीय प्रिंस का सफल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट किया गया। उसकी बड़ी बहन ने अपने स्टेम सेल देकर भाई की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
गंभीर बीमारी से जूझ रहा था 12 साल का प्रिंस
नेपाल के रहने वाले प्रिंस को नवंबर 2025 में लगातार बुखार, शरीर में पीलापन और बार-बार खून बहने की समस्या हो रही थी। हालत बिगड़ने के बाद उसे नोएडा के चाइल्ड पीजीआई में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने जब जांच की तो उसके रेड ब्लड सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स काफी कम पाए गए। इसके बाद बोन मैरो की जांच हुई। रिपोर्ट से पता चला कि उसके शरीर में खून बनाने वाली बोन मैरो लगभग काम करना बंद कर चुकी थी। डॉक्टरों ने इसे एप्लास्टिक एनीमिया बताया। यह एक गंभीर और दुर्लभ बीमारी है, जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में नई रक्त कोशिकाएं नहीं बना पाता।
इलाज के दौरान सामने आया बड़ा फैसला
शुरुआत में डॉक्टरों ने प्रिंस को एंटीबायोटिक्स और ब्लड ट्रांसफ्यूजन के जरिए संभाला। लेकिन उसकी हालत को देखते हुए आगे स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की जरूरत थी। यहीं उसकी बड़ी बहन आगे आई। भाई की जिंदगी बचाने के लिए उसने अपने स्टेम सेल देने का फैसला किया। डॉक्टरों ने बहन की जरूरी मेडिकल जांच की और उसे उपयुक्त डोनर पाया। इसके बाद प्रिंस को ट्रांसप्लांट से पहले कंडीशनिंग कीमोथेरेपी दी गई। 12 नवंबर 2025 को स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू हुई।
साढ़े पांच घंटे चली ट्रांसप्लांट प्रक्रिया
डॉक्टरों की टीम ने करीब साढ़े पांच घंटे की प्रक्रिया के बाद स्टेम सेल प्रिंस के शरीर में सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट किए। इसके बाद उसे आईसीयू में निगरानी में रखा गया। डॉक्टरों के मुताबिक करीब 14 दिन बाद डोनर स्टेम सेल्स ने काम करना शुरू कर दिया। उसके व्हाइट ब्लड सेल्स और प्लेटलेट्स में सुधार आने लगा। खास बात यह रही कि ट्रांसप्लांट के बाद उसे प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन की जरूरत नहीं पड़ी। धीरे-धीरे उसके ब्लड काउंट में लगातार सुधार हुआ और करीब तीन सप्ताह बाद उसे अस्पताल से घर भेज दिया गया।
महीनों तक डॉक्टरों ने रखी निगरानी
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी इलाज खत्म नहीं हुआ। प्रिंस को संक्रमण और ट्रांसप्लांट रिजेक्शन जैसी संभावित जटिलताओं से बचाने के लिए लगातार निगरानी में रखा गया। डॉक्टरों ने उसे जरूरी दवाएं दीं और नियमित जांच की। लगभग एक साल तक इलाज और निगरानी के बाद डॉक्टरों ने प्रिंस के स्वास्थ्य में संतोषजनक सुधार देखा। अब उसे गंभीर बीमारी से उबर चुका माना जा रहा है और आगे भी रूटिन चेकअप के लिए बुलाया जाएगा।
रक्षाबंधन से पहले मिला भाई-बहन को खास तोहफा
भाई-बहन के रिश्ते की यह कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि प्रिंस की जिंदगी बचाने में उसकी बहन का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा। रक्षाबंधन से कुछ दिन पहले डॉक्टरों की ओर से प्रिंस के ठीक होने की खबर परिवार के लिए किसी बड़े तोहफे से कम नहीं थी। यह मामला दिखाता है कि सही समय पर बीमारी की पहचान, आधुनिक चिकित्सा और परिवार का सहयोग मिलकर किसी गंभीर स्थिति से जूझ रहे मरीज को नई उम्मीद दे सकता है।
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