ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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आचार्य रामभद्राचार्य, संत और राम भक्तों में प्रतिष्ठित नाम, ने समाजवादी पार्टी (सपा) के भगवान श्री राम से जुड़े मत पर विवादित बयान पर अपनी आध्यात्मिक और तर्कसंगत राय सार्वजनिक तौर पर व्यक्त की है। उनका कहना है कि भगवान राम किसी राजनीति या पार्टी विशेष के स्वामित्व में नहीं हो सकते और संपूर्ण भारतवासी के लिए समान रूप से पूजनीय हैं।
क्या कहा समाजवादी पार्टी ने?
हाल ही में समाजवादी पार्टी के नेताओं ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह दावा किया था कि “भगवान श्री राम समाजवादी थे या उन्होंने समाजवादी विचारधारा को महत्व दिया।” इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। कई लोगों ने इसे राजनीतिक उद्देश्यों के लिए धार्मिक प्रतीकों का उपयोग बताया, वहीं कुछ लोगों ने इसे धार्मिक भावना का अपमान भी कहा।
रामभद्राचार्य का सीधा जवाब
रामभद्राचार्य ने स्पष्ट कहा कि भगवान श्री राम किसी भी राजनीतिक विचारधारा या पार्टी के प्रतीक नहीं हैं। उनका कहना है कि राम भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्रतीक हैं, और उनकी शिक्षाओं में राष्ट्र, धर्म, समर्पण, सत्य और धर्म की प्रधानता है। उन्होंने कहा कि राम की विचारधारा को किसी एक दल के विचार से जोड़कर समझना गैर-जिम्मेदाराना और अनुचित है।
रामभद्राचार्य ने ये भी कहा कि राम केवल हिंदू या किसी विशेष समुदाय के देवता नहीं हैं, बल्कि पूरे मानवता के आदर्श हैं। राम के चरित्र में सभी सद्गुण निहित हैं — धर्मपरायणता, सत्यनिष्ठा, कर्तव्यभावना और दयालुता। यह धरातल किसी पार्टी विशेष का नहीं हो सकता।
धार्मिक भावना और राजनीति का फर्क
रामभद्राचार्य ने स्पष्ट रूप से कहा कि धर्म और राजनीति दोनों अलग क्षेत्र हैं। राजनीति में विचारधाराएँ हो सकती हैं, पर धर्म को किसी भी राजनीतिक दल विशेष से जोड़ कर प्रचार करना अनुचित है। उन्होंने कहा कि राम का नाम, चरित्र और शिक्षाएँ हर किसी के दिल में बसी हैं, और किसी दल को इसे एकतरफा रूप से प्राप्त करना चाहिए, यह विचार धर्म के मूल तत्त्व और सार्वभौमिकता के खिलाफ है।
समाज में संतुलन और सम्मान की बात
आचार्य रामभद्राचार्य ने यह भी कहा कि समाज में संतुलन, समझ और सम्मान बनाए रखना ज़रूरी है। धार्मिक प्रतीकों और देवताओं को प्रयोग‑आधारित बनाना समाज में ध्रुवीकरण और असंतुलन को बढ़ावा दे सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि ऐसे बयान और दावों को धार्मिक भावनाओं का अपमान न बनने दें और हर धर्म और देवता को सम्मान के साथ देखें। राम के प्रति श्रद्धा का मतलब यह नहीं हो सकता कि उनकी विचारधारा को किसी एक पार्टी के साथ जोड़ दिया जाए।
जन प्रतिक्रिया और सामाजिक बहस
रामभद्राचार्य के बयान के बाद सोशल मीडिया और जनता के बीच बहस तेज़ हो गई है। कुछ लोगों का मानना है कि धार्मिक भावनाओं का राजनीतिकरण ठीक नहीं, जबकि कुछ का कहना है कि हर पार्टी को अपनी विचारधारा के अनुरूप धार्मिक प्रतीकों की आलोचना या समर्थन करने का अधिकार है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष और विविधताओं वाला देश है, जहां धार्मिक श्रद्धा और राजनीतिक विचारधारा को पृथक रखना आवश्यक है।
Jan 14, 2026
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