ज़मीन से जुड़ी सोच और सच्ची खबरें
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उत्तर प्रदेश के संभल में गत दिनों हुई हिंसा की घटना ने एक बार फिर प्रशासन और पुलिस विभाग की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मंगलवार को सीजेएम कोर्ट (CJM Court) ने इस मामले में ASP (सहायक पुलिस अधीक्षक) अनुज चौधरी सहित 12 अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश जारी किए हैं। यह आदेश उस समय आया है जब एक किशोर को गोली लगने से गंभीर रूप से घायल होने की घटना की जांच जारी है।
क्या हुआ था हिंसा के दिन?
संभल हिंसा उस इलाके में सामाजिक तनाव के बीच फैल गई थी। भीड़ की हिंसक गतिविधियों में पुलिस और स्थानीय लोगों के बीच टकराव बढ़ गया। इस दौरान एक किशोर पर गोली चली, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गया। घायल किशोर को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी हालत चिंताजनक रही।
घटना के बाद परिवार और स्थानीय लोगों ने पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि पुलिस बल हिंसा को रोकने में विफल रही और अनुचित कदमों के कारण घटना विकराल रूप ले गई।
कोर्ट ने क्यों दिए FIR दर्ज करने के आदेश?
घटना की जांच के बाद परिवार की ओर से कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। सीजेएम कोर्ट ने जांच में पाया कि कुछ पुलिस अधिकारियों और कर्मियों ने संभवतः अपनी जिम्मेदारियों का सही तरीके से पालन नहीं किया तथा निष्पक्षता में कमी रह सकती है।
इसलिए कोर्ट ने पूर्व ASP अनुज चौधरी, पूर्व कोतवाल अनुज तोमर, सहायक लाइनमैन, शिक्षक, लैब तकनीशियन, वन विभाग के कर्मचारी और एक चालक सहित कुल 15–16 पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने के निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा कि जांच में यदि पुलिस की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होना आवश्यक है।
पुलिस और प्रशासन की प्रतिक्रिया
संभल कोतवाली पुलिस को FIR दर्ज करने के आदेश मिलते ही जांच प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पुलिस टीम सीजेएम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार मामले से जुड़े दस्तावेज़, सबूत और गवाहों के बयान इकट्ठे कर रही है, ताकि FIR दर्ज होने के बाद जांच निष्पक्ष और सटीक ढंग से आगे बढ़ाई जा सके।
पुलिस ने कहा है कि वह कोर्ट के आदेश का पालन करेगी और जांच के दौरान किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं बरतेगी। वहीं, स्थानीय प्रशासन का कहना है कि स्थिति शांत है और कानूनी प्रक्रिया से ही न्याय मिलने की उम्मीद है।
आलोचना और सवाल
पुलिस की भूमिका पर उठ रहे सवालों के बीच यह मामला इस वजह से भी चर्चा में है कि आम तौर पर हिंसा नियंत्रण की जिम्मेदारी पहले पुलिस की मानी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहने पर पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश एक मजबूत संदेश देता है कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है, चाहे वह पुलिस विभाग का ही क्यों न हो।
कुछ स्थानीय शोधकर्ता कहते हैं कि इस घटना ने एक बार फिर यह दिखाया कि कानून व्यवस्था की प्रणाली में सुधार और प्रशिक्षण की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को समय रहते नियंत्रित किया जा सके।
पीड़ित और स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
घायल किशोर के परिवार ने कोर्ट के आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि न्याय होना चाहिए और दोषियों को कड़ी सज़ा मिलनी चाहिए। स्थानीय लोगों ने भी कहा कि कानून का शासन होना चाहिए और पुलिस की भूमिका पर सवालों के जवाब मिलना जरूरी है।
Jan 14, 2026
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